कार्तिक मास: दामोदर की कथा, दीपदान, क्या करें और क्या न करें

कार्तिक की शाम, घी के दीपक और दामोदराष्टक। पढ़िए वह कथा जिससे यह महीना दामोदर मास कहलाता है, और श्रील प्रभुपाद ने इस महीने के लिए क्या करने को कहा।

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कार्तिक मास: दामोदर की कथा, दीपदान, क्या करें और क्या न करें

कार्तिक की शाम कुछ अलग होती है। मंदिरों में और घरों में भगवान के सामने घी के छोटे-छोटे दीपक जलते हैं, और भक्त धीमे स्वर में गाते हैं: नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं… यह दामोदराष्टक है, और यह महीना है कार्तिक, जिसे वैष्णव प्यार से दामोदर मास कहते हैं। इस साल कार्तिक कब से कब तक है और इसके सारे त्योहार किस दिन हैं, यह हमारे कार्तिक मास पेज पर देखें।

कार्तिक की कथा: जब माँ यशोदा ने कान्हा को बाँधा

एक सुबह गोकुल में माँ यशोदा ने दासियों को दूसरे कामों में लगा दिया और खुद दही मथने बैठ गईं। मथते-मथते वे अपने लाला की बाल-लीलाएँ गा रही थीं। हाथों की चूड़ियाँ खनक रही थीं, माथे पर पसीने की बूँदें थीं, और बालों में गुँथे फूल ढीले होकर बिखरने लगे थे।

तभी भूखे कान्हा आ पहुँचे और मथानी पकड़कर खड़े हो गए, मानो कह रहे हों कि पहले मुझे दूध पिलाओ (श्रीमद्भागवतम् 10.9.4)। माँ ने उन्हें गोद में ले लिया। पर उसी समय चूल्हे पर रखा दूध उफनने लगा, और माँ उन्हें बीच में ही उतारकर दूध सँभालने चली गईं।

कान्हा को यह बिल्कुल नहीं भाया। लाल-लाल आँखों और झूठे आँसुओं के साथ उन्होंने पत्थर से दही की मटकी फोड़ दी, माखन उठाया और उल्टे रखे ओखल पर बैठकर बंदरों को बाँटने लगे। बीच-बीच में इधर-उधर देख भी लेते कि कहीं माँ न आ जाएँ।

माँ लौटीं, टूटी मटकी देखी और मुस्कुरा दीं। कृष्ण पुस्तक के अनुसार उन्होंने मन ही मन सोचा कि लाला बड़ा चतुर है, मटकी फोड़कर डर के मारे भाग गया है। हाथ में छड़ी लेकर वे दबे पाँव पीछे से आईं। कान्हा ने देखा और ओखल से कूदकर भाग निकले। श्रील प्रभुपाद लिखते हैं कि माँ यशोदा उन भगवान के पीछे दौड़ रही थीं जिन तक बड़े-बड़े योगी ध्यान में भी नहीं पहुँच पाते।

दौड़ते-दौड़ते माँ के केश खुल गए, फूल धरती पर गिर पड़े, पर आख़िर उन्होंने लाला को पकड़ ही लिया। कान्हा रोने ही वाले थे, और काजल लगी आँखों को बार-बार हाथों से मल रहे थे। माँ का मन पिघल गया। उन्होंने छड़ी फेंक दी और सोचा, बस थोड़ी देर के लिए ओखल से बाँध देती हूँ।

पर जो भी रस्सी लातीं, वह दो उँगली छोटी पड़ जाती। घर की सारी रस्सियाँ जोड़ डालीं, फिर भी दो उँगली कम (श्रीमद्भागवतम् 10.9.15)। माँ मुस्कुरा भी रही थीं और हैरान भी थीं। और तब वह क्षण आया जिसे श्रीमद्भागवतम् इस तरह गाता है:

स्वमातुः स्विन्नगात्राया विस्रस्तकबरस्रजः ।
दृष्ट्वा परिश्रमं कृष्णः कृपयासीत् स्वबन्धने ॥

अर्थ: माँ यशोदा का सारा शरीर पसीने से भीग गया था, बालों से फूल और कंघी गिर रहे थे। अपनी माँ को इस तरह थका देखकर बालक कृष्ण को उन पर दया आ गई, और वे बँधने को तैयार हो गए।

श्रीमद्भागवतम् 10.9.18

जिन्हें कोई नहीं बाँध सकता, वे माँ के प्रेम से बँध गए।

इसी से उनका नाम पड़ा दामोदर। श्रीमद्भागवतम् 10.10.27 के तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद इसे दामोदर-लीला कहते हैं और हरिवंश का श्लोक देते हैं कि रस्सी से बँधने के कारण ही व्रज की गोपियाँ उन्हें दामोदर कहकर गाती हैं। यही कार्तिक की कथा है। पूरे महीने भक्त इसे सुनते-सुनाते हैं, और हर शाम दीपक लेकर उसी बँधे हुए बालक के सामने खड़े होते हैं।

कार्तिक भगवान को इतना प्रिय क्यों है

श्री चैतन्य-चरितामृत (मध्य-लीला 20.201) बताता है कि कार्तिक मास के अधिष्ठाता देव भगवान दामोदर हैं। भक्ति-रसामृत-सिंधु (The Nectar of Devotion, अध्याय 12) में श्रील प्रभुपाद लिखते हैं कि जैसे भगवान दामोदर अपने भक्तों को प्रिय हैं, वैसे ही दामोदर या कार्तिक नाम का यह महीना भी उन्हें बहुत प्रिय है। वहीं वे बताते हैं कि आज भी बहुत से भक्त पूरा कार्तिक मथुरा या वृंदावन में रहकर बिताते हैं।

कार्तिक मास में क्या करें

श्रील प्रभुपाद ने इस महीने को बहुत सरल रखा। 1974 में, कार्तिक शुरू होने से एक हफ़्ता पहले, मायापुर में श्रीमद्भागवतम् 1.8.31 पर बोलते हुए उन्होंने अपने शिष्यों से कहा। उनके शब्दों का भाव यह है: शाम को आप सब विग्रह के सामने, कमरे के बाहर से, एक छोटा दीपक अर्पित करें और दामोदराष्टक, "नमामीश्वरं", गाएँ।

तो जब शाम ढले:

  • घी का एक छोटा दीपक जलाइए और विग्रह के सामने, या घर पर भगवान दामोदर के चित्र के सामने खड़े होइए। यही दीपदान है।
  • दीपक अर्पित करते हुए दामोदराष्टक के आठों श्लोक गाइए। परिवार साथ हो तो सब बारी-बारी से दीपक अर्पित करें और बाकी गाते रहें।
  • दिन में हरे कृष्ण महामंत्र का जप मन लगाकर कीजिए, और दामोदर लीला पढ़िए या सुनिए।

कार्तिक मास में क्या न करें

कार्तिक चातुर्मास्य का अंतिम महीना है। श्री चैतन्य-चरितामृत, मध्य-लीला 4.169 के तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद लिखते हैं कि चातुर्मास्य का उद्देश्य इंद्रियों की तृप्ति को कम करना है, और कार्तिक में मछली या कोई भी मांसाहारी भोजन नहीं करना चाहिए। वे यह भी लिखते हैं कि मसूर और उड़द की दाल भी इसी श्रेणी में गिनी जाती हैं, इसलिए कार्तिक में इनसे भी बचें।

कुरुक्षेत्र में कार्तिक

कार्तिक की हर शाम इस्कॉन कुरुक्षेत्र में भक्त भगवान दामोदर को दीपक अर्पित करते हैं और मिलकर दामोदराष्टक गाते हैं। जिस भूमि पर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता सुनाई, वहाँ आकर आप भी एक दीपक अर्पित कीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कार्तिक मास को दामोदर मास क्यों कहते हैं?
क्योंकि श्री चैतन्य-चरितामृत के अनुसार इस महीने के अधिष्ठाता देव भगवान दामोदर हैं, यानी वह बालक कृष्ण जिन्हें माँ यशोदा ने रस्सी से बाँधा था।

कार्तिक मास में क्या नहीं खाना चाहिए?
श्रील प्रभुपाद के अनुसार कार्तिक में मछली और कोई भी मांसाहारी भोजन नहीं खाना चाहिए, और मसूर व उड़द की दाल से भी बचना चाहिए।

कार्तिक में दीपदान कैसे करें?
शाम को विग्रह या भगवान दामोदर के चित्र के सामने घी का छोटा दीपक अर्पित करें और साथ में दामोदराष्टक गाएँ।

कार्तिक की कथा क्या है?
दामोदर लीला: माँ यशोदा ने बालक कृष्ण को ओखल से बाँधना चाहा, हर रस्सी दो उँगली छोटी पड़ी, और अंत में माँ के प्रेम से भगवान स्वयं बँध गए। यह कथा श्रीमद्भागवतम् के दसवें स्कंध के नौवें अध्याय में है।

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